क्यों मै सोचता हु की मै हु....
मैं हु इस जहाँ के लिए.....
करना हैं बहुत कुछ...
दिखाना हैं हैं की हैं जो मुझमे ,नहीं किसी और मे.
और हु मैं बहुत आंगे पर अलग..
जहा बस एक भीड़ हैं..
पे पता हु की ..हु मैं शुरू से खुद से ही पीछे..
और पीछे रह जाता तो शायद मैं अलग हो जाता ..
अकेला और एकांत मे हो जाता इस दुनिया से
यही सोच कर मे भागता रहा हु..
दौड़ता रहा हु..
थका बहुत हु की मैंने खुद से हे प्रतियोगिता की हैं.
और जो है न मेरे जैसे हे उनसे हे जितने की चेष्टा की..
जो जान रहे की मैं जीत गया .और जी जान गए की मैं हु निराश. और कमजोर..और हार गए..
यहिएँ तो चला हैं की हम कब तक हर्र बार खेले ,जीते हैं..
पर जाने क्यों हम हार बार सब पाकर भी हारे हैं..
