Monday, October 1, 2012

क्यों मै सोचता हु की मै हु....


क्यों मै सोचता हु की मै हु....
मैं हु इस जहाँ के लिए.....
करना हैं बहुत कुछ...
दिखाना हैं हैं की हैं जो मुझमे ,नहीं किसी और मे.
और हु मैं बहुत आंगे पर अलग..
जहा बस  एक भीड़ हैं..
पे पता हु की ..हु मैं शुरू से खुद से ही  पीछे..
और पीछे रह जाता तो शायद मैं अलग हो जाता ..
अकेला और एकांत मे हो जाता इस दुनिया से
यही सोच कर मे भागता रहा हु..
दौड़ता रहा हु..
थका  बहुत हु की मैंने खुद से हे प्रतियोगिता की हैं.
और जो है न मेरे जैसे हे उनसे हे जितने की चेष्टा की..
जो जान रहे की मैं जीत गया .और जी जान गए की मैं हु निराश. और कमजोर..और  हार गए..
यहिएँ तो चला हैं की हम कब तक हर्र बार खेले ,जीते हैं..
पर जाने क्यों हम हार बार सब पाकर भी हारे हैं..

Friday, September 28, 2012

अंतर वेदना


अंतर वेदना

न जाने कब ये सत्य प्रकट हो पायेगा

.न जाने कब जे आत्म शोधन  हो पायेगा,

कब तक  जिज्ञाषा यु ही समाधान खोजेंगी

और कब तक ये कुंठित अभिलाषाए मुझे रोकेंगी

.कब तक में यु हे  रुकर टूटता रहूँगा 

कब तक यु हे में खुद को खोजता रहूँगा

मृत मान में कब बशंत  ऋतू आएगी

और कब ये मेरे चित में नयी चेतना लाएगी 

पल पल बीतता  ये जीवन कब अपनी मंजिल पायेगा

सब कुछ पाकर भी ये खुद को विवश हे पायेगा 

भांति भांति के रंगों में में खुद को कब तक रंगुगा 

क्या नहीं कोई मेरा रंग जिसे में खुद का कह सकूँगा 

मेरा रंग अब मुझे खोजना हैं 

कहे कोई  कुछ भी बस यही मेरी अंतर वेदना हैं...