अंतर वेदना
अंतर वेदना
न जाने कब ये सत्य प्रकट हो पायेगा
.न जाने कब जे आत्म शोधन हो पायेगा,
कब तक जिज्ञाषा यु ही समाधान खोजेंगी
और कब तक ये कुंठित अभिलाषाए मुझे रोकेंगी
.कब तक में यु हे रुकर टूटता रहूँगा
कब तक यु हे में खुद को खोजता रहूँगा
मृत मान में कब बशंत ऋतू आएगी
और कब ये मेरे चित में नयी चेतना लाएगी
पल पल बीतता ये जीवन कब अपनी मंजिल पायेगा
सब कुछ पाकर भी ये खुद को विवश हे पायेगा
भांति भांति के रंगों में में खुद को कब तक रंगुगा
क्या नहीं कोई मेरा रंग जिसे में खुद का कह सकूँगा
मेरा रंग अब मुझे खोजना हैं
कहे कोई कुछ भी बस यही मेरी अंतर वेदना हैं...
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